Tuesday, 24 September 2013

" मैं सरिता हूँ "


मैं सरिता हूँ
सतत प्रवाहमयी
प्रवाहिनी
गति हीं मेरा जीवन है
इसलिए शिप्रा
हाँ तरंगिणी हूँ
बहती ...
अनवरत
निर्झरिणी हूँ
मेरे जन्म के साथी
बर्फ़ानी शिलाखण्ड
वनस्पतियाँ, अखुए,
पेड़-पौधे
मेरे हाथों को,
मेरे आँचल को
पकड़-थाम
रोकते हैं मुझे
पर मैं कहाँ रुकने वाली
मेरी कृष-काया और भी उत्साह
और शक्ति से बहती जाती है
मैं सारंगा, प्रवाहिनी
चलती जाऊँगी
अपने प्रियतम साँवरे सागर से मिलकर
उसी में लीन होने .... !!
© कंचन पाठक.